दिवाली का जश्न खत्म होते ही हमारे घरों में जिस महापर्व की सबसे ज़्यादा रौनक और तैयारी दिखने लगती है, वो है 'छठ पूजा'। सच कहें तो यह दुनिया का शायद इकलौता ऐसा त्योहार है, जहाँ सिर्फ उगते हुए सूरज को ही नहीं, बल्कि डूबते हुए सूरज को भी पूरी आस्था के साथ पूजा जाता है।
कभी सिर्फ बिहार, झारखंड और पूर्वी यूपी की पहचान रहा यह पर्व, आज दिल्ली-मुंबई से लेकर विदेशों तक बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाने लगा है। घाटों की साफ-सफाई, नए सूप-दौरे, देसी घी में बनते ठेकुए की वो सोंधी सी महक और कानों में गूंजता छठी मैया का पारंपरिक गीत "केलवा जे फरेला घवद से..." ये सब मिलकर पूरे माहौल को एक अजीब से सुकून और पवित्रता से भर देते हैं।
अगर आप भी इस बार छठ का पावन व्रत करने वाले हैं, तो चलिए बहुत ही आसान भाषा में जानते हैं कि साल 2026 में छठ पूजा की तारीखें क्या हैं, पूजा का सही तरीका क्या है और इसके वो कौन से ज़रूरी नियम हैं जिनका हमें ध्यान रखना चाहिए।
छठ पूजा 2026 की तारीखें
पंचांग के अनुसार छठ पूजा 2026 में नहाय-खाय शुक्रवार 13 नवंबर से शुरू होगी और उषा अर्घ्य सोमवार 16 नवंबर को दिया जाएगा। पूरा कार्यक्रम इस प्रकार है:
13 नवंबर 2026 (शुक्रवार): नहाय-खाय
14 नवंबर 2026 (शनिवार): खरना
15 नवंबर 2026 (रविवार): संध्या अर्घ्य (मुख्य छठ)
16 नवंबर 2026 (सोमवार): उषा अर्घ्य और पारण
षष्ठी तिथि 14 नवंबर की रात 11:24 बजे शुरू होकर 16 नवंबर को रात 2:01 बजे तक रहेगी। इसी कारण मुख्य संध्या अर्घ्य 15 नवंबर को पड़ता है।
अर्घ्य का समय: सूर्यास्त और सूर्योदय का समय हर शहर में अलग होता है। उदाहरण के लिए, पटना में संध्या अर्घ्य शाम 5:02 बजे और उषा अर्घ्य सुबह 6:06 बजे है। दिल्ली में 15 नवंबर को सूर्यास्त लगभग शाम 5:27 बजे है। अपने शहर का सटीक समय स्थानीय पंचांग या घाट समिति से ज़रूर जाँच लें, और घाट पर कम से कम 30-40 मिनट पहले पहुँचें।
छठ पूजा का महत्व
छठ पर सूर्य देव और छठी मैया की उपासना होती है। सूर्य को जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य का स्रोत माना गया है, जबकि छठी मैया को संतान की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन से व्रत रखने पर संतान सुख, परिवार की समृद्धि और रोगों से मुक्ति मिलती है। इसीलिए संतान की कामना रखने वाले और अपने बच्चों के लंबे जीवन की प्रार्थना करने वाले परिवार इस व्रत को बहुत श्रद्धा से करते हैं।
पौराणिक कथाएँ
छठ से जुड़ी कई कथाएँ प्रचलित हैं। इनमें से कुछ प्रमुख ये हैं:
राजा प्रियव्रत की कथा: संतानहीन राजा प्रियव्रत ने महर्षि कश्यप के कहने पर यज्ञ किया, पर पुत्र मृत जन्मा। तब देवी षष्ठी प्रकट हुईं और उनकी कृपा से बालक जीवित हो उठा। तभी से षष्ठी देवी की पूजा की परंपरा मानी जाती है।
सीता माता और भगवान राम: लोकमान्यता है कि लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना पर सीता जी ने सूर्य षष्ठी का व्रत किया था।
कर्ण की उपासना: मान्यता है कि सूर्यपुत्र कर्ण ने सबसे पहले छठ पूजा की थी। कहा जाता है कि वे रोज़ कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे।
द्रौपदी का व्रत: पांडवों के कठिन समय में द्रौपदी ने भी सूर्य षष्ठी का व्रत रखा, जिससे उन्हें अपना खोया राज्य वापस मिला।
चार दिनों का अनुष्ठान
पहला दिन: नहाय-खाय (13 नवंबर)
व्रती सुबह नदी, तालाब या घर में स्नान करके पूरे घर की शुद्धि करते हैं। इसके बाद सात्विक भोजन बनता है, जिसमें अक्सर कद्दू की सब्ज़ी, चने की दाल और अरवा चावल होते हैं। यह भोजन मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी की आँच से बनाने की परंपरा है। व्रती पहले भोजन करते हैं, फिर परिवार के बाकी सदस्य। लहसुन-प्याज़ का प्रयोग पूरी तरह वर्जित रहता है।
दूसरा दिन: खरना (14 नवंबर)
इस दिन व्रती दिन भर निर्जल उपवास रखते हैं। शाम को सूर्यास्त के बाद गुड़ की खीर (रसिया) और रोटी बनाकर पहले छठी मैया को भोग लगाया जाता है। उसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं। एक नियम यह भी है कि प्रसाद ग्रहण करते समय घर में शांति रहे, क्योंकि कोई आवाज़ आने पर परंपरा के अनुसार व्रती भोजन छोड़ देते हैं। इसके बाद लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य (15 नवंबर)
यह छठ का सबसे भव्य दिन है। सुबह से ठेकुआ, चावल के लड्डू (कसार) और फल सजाने की तैयारी होती है। प्रसाद बाँस की टोकरी या सूप में सजाया जाता है, जिसमें केला, नारियल, गन्ना, नींबू, सिंघाड़ा, सुथनी और दीपक रखे जाते हैं। परिवार के लोग दउरा (टोकरी) सिर पर उठाकर नंगे पाँव घाट जाते हैं। रास्ते में छठ के गीत गूँजते हैं। घाट पर व्रती कमर तक जल में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं, जबकि परिवार सूप में रखे प्रसाद पर दूध और जल अर्पित करता है। शाम को घर लौटकर कोसी भरने की रस्म भी कई परिवारों में निभाई जाती है।
चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण (16 नवंबर)
अगली सुबह सूर्योदय से पहले ही श्रद्धालु घाट पर पहुँच जाते हैं। उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रती छठी मैया से परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं। इसके बाद प्रसाद बाँटा जाता है, और व्रती अदरक-गुड़ या प्रसाद से अपना व्रत तोड़ते हैं। इसे पारण कहते हैं।
प्रसाद और पूजा सामग्री
छठ में शुद्धता सबसे ज़रूरी है। मुख्य सामग्री इस प्रकार है:
बाँस का सूप और दउरा
ठेकुआ (गेहूँ के आटे, गुड़ और घी से बना)
केला, नारियल, गन्ना, सेब, नारंगी, सिंघाड़ा
चावल का लड्डू, गुड़ की खीर
मिट्टी का दीया, धूप, रोली, चावल और अदरक-हल्दी का पौधा
नई साड़ी या धोती (व्रती के लिए)
व्रत के नियम और सावधानियाँ
चार दिनों तक घर में सात्विकता बनाए रखें और प्याज़-लहसुन, मांस-मदिरा से दूर रहें।
प्रसाद बनाने से पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
ठेकुआ बनाते समय उसे जूठा न करें और प्रसाद को बिना स्नान के न छुएँ।
घाट पर भीड़ में सावधानी रखें और बच्चों व बुज़ुर्गों का विशेष ध्यान रखें।
जो लोग मधुमेह, बीपी या किसी अन्य बीमारी से पीड़ित हैं, वे निर्जला व्रत से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
घाट पर साबुन, प्लास्टिक और कचरे का प्रयोग न करें। यह पर्व प्रकृति का है, इसे स्वच्छ रखना भी पूजा का हिस्सा है।
सामाजिक पक्ष
छठ की सबसे सुंदर बात इसका समानता वाला स्वरूप है। इसमें न कोई पुरोहित अनिवार्य है, न कोई मंदिर। अमीर-गरीब, सब एक ही घाट पर एक जैसे सूप और एक जैसे गीतों के साथ खड़े होते हैं। पड़ोसी मिलकर घाट बनाते हैं और रास्ते साफ़ करते हैं। इस छठ पर्व आप अपने बच्चे की व्यक्तिगत कुंडली रिपोर्ट भी बना सकते हैं या एस्ट्रो अरुण पंडित पर फ्री में कुंडली भी बनवा सकते हैं।
निष्कर्ष
छठ महापर्व केवल एक व्रत नहीं है, यह अनुशासन, शुद्धता और कृतज्ञता की साधना है। 2026 में 13 से 16 नवंबर के बीच जब घाटों पर दीयों की कतारें सजेंगी और श्रद्धालु जल में खड़े होकर सूर्य को नमन करेंगे, तब यह परंपरा एक बार फिर हमें प्रकृति और परिवार से जोड़ेगी।
एस्ट्रो अरुण पंडित की ओर से आप सभी को छठ 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं। जय छठी मैया!