बचपन में दादी जब आँगन में गन्ने खड़े करके चौक पूरती थीं, तो हम बच्चे बस इतना जानते थे कि आज घर में कुछ ख़ास है। शाम को दीये जलते, थाली बजाई जाती और दादी एक सुर में गुनगुनाती थीं, "उठो देव, बैठो देव, अंगुरिया चटकाओ देव।" तब मतलब समझ नहीं आता था, बस इतना लगता था कि कोई अपना सोकर उठ रहा है और पूरा घर उसे प्यार से जगा रहा है।

बड़े होकर समझ आया कि यही तो है देव उठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं।

देव उठनी एकादशी कब है?

यह पर्व हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है, यानी दिवाली के लगभग ग्यारह दिन बाद। साल 2026 में यह नवंबर के तीसरे सप्ताह में, 20 नवंबर के आसपास पड़ रही है। एकादशी की तिथि और पारण का सही समय आपके शहर के अनुसार थोड़ा बदल सकता है, इसलिए व्रत रखने से पहले स्थानीय पंचांग या अपने पंडित जी से एक बार पुष्टि कर लें।

चार महीने की योगनिद्रा का रहस्य

मान्यता है कि आषाढ़ मास की देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद चार महीने का समय आता है, जिसे चातुर्मास कहते हैं। इस दौरान शादी-ब्याह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।

कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं और उसी के साथ रुके हुए सारे शुभ काम फिर शुरू हो जाते हैं। इसीलिए इस दिन के बाद से शादियों की शहनाइयाँ गूँजने लगती हैं और बाज़ारों में रौनक लौट आती है। आपके मोहल्ले में अचानक बैंड-बाजे की आवाज़ें बढ़ जाएँ, तो समझ जाइए कि देव उठ गए हैं।

तुलसी विवाह: इस दिन की सबसे प्यारी परंपरा

देव उठनी एकादशी का एक बहुत सुंदर पहलू है तुलसी विवाह। इस दिन तुलसी माता का विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से कराया जाता है।

कथा के अनुसार, तुलसी पूर्व जन्म में वृंदा नाम की एक पतिव्रता स्त्री थीं, जिनके पति जालंधर नामक असुर थे। वृंदा के सतीत्व के कारण जालंधर को हराना असंभव था। तब भगवान विष्णु ने एक लीला रची, जिसके बाद जालंधर का अंत हुआ। वृंदा ने दुखी होकर विष्णु जी को पत्थर बनने का श्राप दे दिया। बाद में उन्होंने वह श्राप स्वीकार किया और वरदान दिया कि वृंदा तुलसी के रूप में सदा उनके साथ पूजी जाएँगी। इसी कारण शालिग्राम और तुलसी का विवाह हर साल बड़े चाव से किया जाता है।

पूजा कैसे करें? सरल विधि

पूजा में बहुत तामझाम की ज़रूरत नहीं होती। श्रद्धा सबसे ज़रूरी है। फिर भी परंपरागत विधि कुछ इस तरह है:

  1. सुबह स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें।

  2. आँगन या पूजा स्थल पर चौक बनाएँ। गेरू या आटे से भगवान विष्णु के चरण चिह्न बनाए जाते हैं, जो उनके आगमन का प्रतीक माने जाते हैं।

  3. पूजन सामग्री रखें: गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, मौसमी फल, फूल, हल्दी, रोली और दीपक।

  4. शाम को दीप जलाकर भगवान विष्णु की पूजा करें और शंख, घंटी या थाली बजाकर उन्हें जगाएँ।

  5. जागरण मंत्र बोलें: "उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते। त्वयि सुप्те जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥"

  6. फिर तुलसी विवाह संपन्न करें और आरती के बाद प्रसाद बाँटें।

गन्ने का मंडप बनाना इस दिन की ख़ास रीत है। चार गन्ने खड़े करके ऊपर से बाँध दिए जाते हैं और उसी के नीचे तुलसी और शालिग्राम को बैठाया जाता है। इसमें चढ़ने वाले सारे फल और सब्ज़ियाँ इसी मौसम की होती हैं, यानी प्रकृति के प्रति आभार भी इस पूजा में अपने आप जुड़ जाता है।

व्रत के नियम और खान-पान

एकादशी का व्रत कई लोग निर्जल रखते हैं, तो कई फलाहार पर रहते हैं। आप अपनी सेहत के हिसाब से जो ठीक लगे, वही चुनें। बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएँ और बच्चे अपनी क्षमता के अनुसार हल्का फलाहार ले सकते हैं। भूखे रहना कोई प्रतियोगिता नहीं है।

सामान्य नियम ये हैं:

  • इस दिन चावल और अनाज नहीं खाए जाते।

  • प्याज़, लहसुन और तामसिक भोजन से दूर रहें।

  • फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और सेंधा नमक का उपयोग किया जा सकता है।

  • मन को शांत रखें और क्रोध, झगड़े और बुरे विचारों से बचें।

  • अगले दिन द्वादशी को शुभ मुहूर्त में पारण करके व्रत खोलें।

इसी दिन खाटू श्याम बाबा का जन्मोत्सव भी

देव उठनी एकादशी की एक और ख़ास बात यह है कि इसी दिन खाटू श्याम जी का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। राजस्थान के सीकर ज़िले के खाटू गाँव में बाबा श्याम का मंदिर है, और इस दिन वहाँ भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। जो लोग वहाँ नहीं जा पाते, वे घर में ही बाबा की तस्वीर के सामने दीया जलाकर, भजन गाकर और खीर-चूरमे का भोग लगाकर यह दिन मनाते हैं।

मान्यता है कि खाटू श्याम जी का संबंध महाभारत के वीर बर्बरीक से है, जो घटोत्कच के पुत्र और भीम के पोते थे। कहा जाता है कि बर्बरीक ने अपनी माँ को वचन दिया था कि युद्ध में जो पक्ष कमज़ोर होगा, वे उसी का साथ देंगे। भगवान कृष्ण जानते थे कि ऐसे में युद्ध का संतुलन बिगड़ जाएगा। इसलिए उन्होंने बर्बरीक से दान में उनका शीश माँग लिया। बर्बरीक ने बिना झिझक अपना शीश अर्पित कर दिया। प्रसन्न होकर कृष्ण ने वरदान दिया कि कलियुग में वे "श्याम" नाम से पूजे जाएँगे। इसीलिए भक्त उन्हें प्यार से "हारे का सहारा" कहते हैं। 

देव उठनी एकादशी पर एस्ट्रो अरुण पंडित जी का खास सन्देश

अगर हम कथाओं और रीति-रिवाजों से थोड़ा ऊपर उठकर देखें, तो देव उठनी एकादशी हमें कई सुंदर बातें सिखाती है।

पहली बात, ठहराव के बाद फिर शुरुआत। चार महीने का विराम जीवन में भी ज़रूरी है। रुकना, सोचना और ख़ुद को समेटना बुरा नहीं है। पर फिर उठना भी उतना ही ज़रूरी है।

दूसरी बात, प्रकृति से जुड़ाव। तुलसी की पूजा और मौसमी फलों का भोग हमें याद दिलाता है कि हमारा जीवन पेड़-पौधों और धरती से जुड़ा है।

तीसरी बात, परिवार का साथ। इस दिन पूरा परिवार आँगन में इकट्ठा होता है। बच्चे गन्ना पकड़ते हैं, महिलाएँ गीत गाती हैं और बड़े आशीर्वाद देते हैं। आज की भागदौड़ में ऐसे मौक़े बहुत क़ीमती हैं।

अगर आप अपनी कुंडली को लेकर परेशान हैं, तो कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है। आप सीधे एस्ट्रो अरुण पंडित जी के 'फ्री कुंडली कैलकुलेटर' से अपनी जन्म कुंडली एकदम मुफ्त में बना सकते हैं। बस अपनी जन्म की तारीख, समय और जगह डालिए।

निष्कर्ष

देव उठनी एकादशी सिर्फ़ एक तिथि नहीं है, यह उम्मीद के लौटने का त्योहार है। जैसे भगवान विष्णु जागकर सृष्टि का काम फिर सँभालते हैं, वैसे ही हम भी अपनी थकान और आलस छोड़कर नई शुरुआत कर सकते हैं।

आप सभी को देव उठनी एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपके घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे।